एकलव्य की कहानी महाभारत से – Eklavya Biography, Story & Death

By | January 11, 2017

जानिए धनुधर एकलव्य  से जुडी story in Hindi – उनकी पूरी biography, कैसे द्रोणाचार्य से विद्या ली, उनके परिवार, और कैसे श्री कृष्णा के द्वारा वध हुआ | प्राचीन काल में  शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को गुरुकुल या आश्रम जाना पड़ता था । शिक्षा ग्रहण करने के दवरान सभी विद्यार्थी आश्रम में हीं अपने गुरु के पास रहा करते थे । सभी एक साथ एक परिवार की तरह रहते थे और अपने गुरु की हर बात मानते थे। उसी समय आश्रम में एक और शिष्य शिक्षा प्राप्त करने के लिए रहा करता था जिसका नाम “एकलव्य” था। एकलव्य के हुनर की वजह से आज उसका नाम इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया है ।

Eklavya biography in Hindi

एकलव्य की कहानी / Story of Eklavya 

“एकलव्य”  महाभारत  का हीं एक Character कहलाता है। ये हिरण्यधनु और सुलेखा के पुत्र थे। एकलव्य के जन्म के बाद इनका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया था और बचपन में सब इन्हें “अभय” नाम से पुकारते थे । अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ अभय की लगन व निष्ठा को देखते हुए इनके गुरू ने इन्हें एक नया नाम दिया “एकलव्य” । बचपन से हीं एकलव्य ने गुरुकुल जाकर अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा ग्रहण की और जब वे बड़े हो गए तो उनकी शादी उन्ही के पिता के मित्र की कन्या से कर दी गई जिसका नाम “सुणीता” था ।

एकलव्य अपनी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा से संतुष्ट नहीं थे इसलिए अस्त्र शस्त्र की उच्च शिक्षा पाने के लिए उन्होंने गुरू द्रोणाचार्य के पास जाने का निर्णय लिया । उस वक्त केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग को हीं शिक्षा दी जाती थी और ये बात एकलव्य के पिता हिरण्यधनु को मालूम था । हिरण्यधनु ने एकलव्य को ये बात बताई थी लेकिन अस्त्र शस्त्र सीखने का जूनून और द्रोणाचार्य को अपनी कलाओं से प्रभावित करने की सोच ने एकलव्य को उनके पास जाने से ना रोक सका ।

एकलव्य ने कैसे द्रोणाचार्य से धनुस विद्या सीखी / How Eklavya learn Bow-Arrow 

एकलव्य द्रोणाचार्य  के पास गाय तो वहां उन्होंने देखा की गुरु द्रोणाचार्य पांडवो व कोरवो को अस्त्र शस्त्र चलाना सिखा रहे थे ।  एकलव्य ने  द्रोणाचार्य को प्रणाम करके हुए कहा की हे आचार्य मै  निषादपुत्र एकलव्य हूँ ।  क्या आप मुझे भी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा देंगे ? चूँकि एकलव्य एक निषादपुत्र थे इसलिए द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाने से माना कर दिया । परन्तु एकलव्य को ये बात बिलकुल भी बुडी नहीं लगी । एकलव्य  ने वहीँ आश्रम के पास वन में एक कुटिया बना कर वहां  द्रोणाचार्य जी की एक प्रतिमा भी बना दी और उसी जगह रह कर धनुर्विद्या प्राप्त करने की ठान  ली थी ।

एक दिन द्रोणाचार्य अपने कुछ शिष्यों और एक कुत्ते को ले कर उसी वन में गए जिस वन में एकलव्य रह रहा था । अचानक से कुत्ता अपना रास्ता भटक गया और एकलव्य के कुटिया  के निकट  पहुँच कर जोड़ जोड़ से भौंकने लगा । उसके आवाज को बंद करने के लिए एकलव्य ने सीधा उसके मुँह में तीर का निशाना लगा दिया जिससे कुत्ता का मुँह बंद हो गया । कुत्ता डर के वहां से भाग कर द्रोणाचार्य के पास चला गया । कुत्ते के मुँह में तीर देख कर द्रोणाचार्य को बड़ा आश्चर्य लगा ।  क्योंकि कुत्ते के मुँह में इस तरीके से तीर मारा गया था की उसे ज़रा भी चोट नहीं लगी थी केवल उसका पूरा मुँह वाण से भर गया था । ऐसा किसने किया ये पता लगाने के लिए द्रोणाचार्य उस धनुर्धर की खोज में निकल गए ।


Eklavya close dog's mouth with arrow

एकलव्य का गुरु दक्षिणा

धनुर्धर को ढूँढ़ते ढूँढ़ते द्रोणाचार्य एकलव्य की कुटिया में पहुँच गए और वहां उन्होंने देखा की एकलव्य उनकी हीं प्रतिमा के सामने अस्त्र शस्त्र का अभ्यास कर रहे थे । आचार्य द्रोणाचार्य को ये सब देख कर बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने एकलव्य से कहा की यदि तुम मुझे अपना गुरु समझते हो तो तुम्हे मुझे गुरु दक्षिणा भी देनी होगी । एकलव्य गुरु दक्षिणा देने के लिए तैयार हो गया और द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य से उसके अंगूठे की मांग कर दी । उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उन्हें डर था की कहीं एकलव्य सबसे अच्छा धनुर्धर ना बन जाए और अगर ऐसा होता है तो द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन को सबसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन झूठा हो जाएगा। एकलव्य ने  बिना कुछ कहे चुप चाप अपना अंगूठा द्रोणाचार्य को अर्पित कर दिया।

Eklavya cut his thumb in fort on Dronacharya

ये भी कहा जाता है की हो सकता है कि द्रोणाचार्य एकलव्य को बिना अँगूठे के धनुष चलाने की विशेष विद्या देना चाह रहे हों इसलिए उन्होंने गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया। साथ हीं ये भी कहा जाता है की अंगूठा कटने के बाद एकलव्य अपने तर्जनी व मध्यमा अंगुली की सहायता से तीर चलाने लगा और तभी से तीरंदाजी करने के ये आधुनिक तरीका शुरु हो गया ।

तीरंदाजी की शिक्षा पूरी हो जाने के बाद एकलव्य श्रृंगबेर राज्य लौट आये। पिता की मौत हो जाने के बाद एकलव्य वहाँ के राजा बन गए। श्रृंगबेर का राजा बन जाने के पश्चात् एकलव्य ने अपने राज्य का विस्तार किया।

एकलव्य की मृत्यु कैसे हुई / How Eklavya was killed?

हिन्दू धार्मिक पुराणों के मुताबिक़ निषाद वंश का राजा बन जाने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की ओर से मथुरा पर हमला किया और वहां के लगभग सभी यादव सेना को मार गिराया । जब भगवान् श्री कृष्ण ने बिना अंगूठे वाले एकलव्य को धनुष चलाते देखा तो उन्हें भी यह देख कर काफी  आश्चर्य  हुआ की किसे बिना अंगूठे की वह अकेले कई पर भारी पड़ रहा है । एकलव्य ने अकेले ही यादव वंश के सभी योद्धाओं को हरा दिया था । ये देख कर युद्ध में  श्री कृष्ण ने एकलव्य का वध कर दिया |

श्री कृष्ण भी यही चाहते थे की उनका सबसे प्रिय “अर्जुन” जिसने द्रोणाचार्य से हीं अस्त्र शस्त्र की शिक्षा ली थी वही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाये इसलिए यह भी एक कारण है की उन्होंने एकलव्य का वध कर दिया ।

Image Source: newstrend.news

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *