काजू की उन्नत खेती कैसे करे – Cashew Farming

By | January 25, 2017

जानिए कैसे आप काजू की उन्नत खेती कर सकते हैं | काजू को Cashew भी बोला जाता है – यह एक सरल और profitable business है, जानिए plant लगाने से तुड़ाई तक की जानकारी | काजू एक तरह का पेड़ होता है जिसके फलो को dry fruits के रूप में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। काजू की खेती कर के किसानो को बहुत फायदा हो सकता है क्योंकि आज के date में काजू की कीमत बहुत ज्यादा हो चुकी है । यही नहीं India में काजू का आयात और निर्यात का व्यापार भी काफी जोर सोर से चल रहा है । तो चलिए जानते है kaju ki kheti कैसे की जाती है ।

Kaju Cashew Farming in Hindi

 

भारत में काजू उत्पादक राज्य / Major Cashew Production State 

Hamare India mein kuch aise states hain jahan par Kaju ki acchi paidawar hoti hai, in states ke naam is prakar hain:

  • केरल
  • कर्नाटक
  • महाराष्ट्र
  • तमिलनाडु के पूर्वी तट,
  • ओडीशा,
  • पश्चिम बंगाल
  • पुदुचेरी के समुद्रतटीय क्षेत्रों

 

भूमि का चयन / Selection of Land

काजू की खेती को बहुत तरह की भूमियों पर किया जा सकता है। काजू की खेती को ढलान वाली भूमि में भूक्षरण (कटाव) रोकने के लिए किया जाता है। काजू की अच्छी उत्पादन के लिए गहरी दोमट मृदा को सबसे अच्छा माना गया है। काजू western coastal areas  में बालू के ढेर पर भी अच्छे से उगता है ।

काजू की खेती के लिए  सही जलवायु . Favorable Climate for Cashew Farming

काजू की खेती के लिए tropical climate को सर्वोत्तम माना गया है। समुद्रतट से 1000 meter तक की height पर काजू की खेती की जा सकती है इसके लिए Moist और medium climate बहुत जरूरी होती है। काजू की खेती में काजू के उत्पादन हेतु उपयुक्त तापमान लगभग 20°C होनी चाहिए और सालाना 1000 से 2000 mm वर्षा होनी चाहिए । पेड़ पर फूल तथा फल लगने समय 36 °C से ज्यादा तापमान नहीं होना चाहिए । अच्छी फल की उपज हेतु साल में at least 4 महीने मौसम सूखा रहना चाहिए ।

काजू की किस्मे / Types of Cashew 

वैसे तो काजू के तरह तरह के किस्मे होती है परन्तु मुख्य तौर पर 6 types के cashew पाए जाते है जो की इस प्रकार है :

  • आंध्र प्रदेश में पाए जाने वाले किस्मे – बी.पी.पी. 4, बी.पी.पी. 6, बी.पी.पी. 8, ।
  • ओडिशा में पाए जाने वाले किस्मे – भुवनेचवर 1, बीपीपी और घना ।
  • तमिलनाडु के किस्मे – वी.आर.आई 1, वी.आर.आई 2, वी.आर.आई 3 आदि ।
  • पश्चिमी तट की किस्मे – वेंगुर्ला 1, वेंगुर्ला 2, वेंगुर्ला 3, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 5, आदि ।
  • केरल की किस्मे – के 22–1, अनकायम १ (बी.एल.ए. १३९-१), धना (एच. १६०८), प्रियंका (एच. १५९१), कनका (एच. १५९८) आदि ।
  • कर्नाटक में होने वाले किस्म – चिन्तामणि -1, उल्लाल-1, उल्लाल- 2, उल्लाल-3, उल्लाल-4, आदि।

बीज-बुवाई का तरीका :-
काजू का प्रवर्धन दो तरह से की जा सकता है –

  1. बीज द्वारा
  2. सोप्टावुड ग्राफटिंग

1. बीज द्वारा – बीज को बोने से पूर्व गड्ढे खोद लिए जाते है, उसके बाद हर एक गड्ढे में 2-2 बीज कर के बो दिये जाते हैं। starting में बीज को june के time में बोया जाता हैं। लगभग 4 week के बाद ये बोया हुआ बीज जम जाता हैं और इसके जमने के बाद एक जगह पर एक पौधा रखा जाता है। After 5 years इन पौधों में से कुछ पौधों को निकाल दिया जाता है। पौधे को रोपने समय दो पौधों के बीज की दूरी लगभग 12m होनी चाहिए।
2. सोप्टावुड ग्राफटिंग – इस process में पौधे को तैयार होने में केवल दो साल लगता है। इन्हें बोने का सही time july से august तक का होता।

Agar aap kam samay mein acchi munafa kamana chahate hai to Kesar ki unnat kheti aur Kapas ki kheti kaise ki jati hai ko jarur se padhe.

खाद  प्रबंधन /  Fertilizer Management 

   काजू की खेती में अच्छे उपज हेतु मिट्टी में एनपी का sufficient अनुपात होना जरूरी होता है। हर एक पौधे को लगभग 10-15 kg खाद की जरुरत होती है । काजू के पेड़ के लिए जिन उर्वरको का use किया जाता है वो है – 500 g nitrogen, 7.50 g single super Phosphate और 200 g Muriate of potash । इन उर्वरको का use वर्षा रुकने के फ़ौरन बाद ही किया जाना चाहिए। खाद का use करने से पूर्व मिट्टी की नमी को check कर लें । खाद का उपयोग दो बार किया जा सकता है पहला वर्षा-ऋतु के पूर्व यानि की  may से june तक और फिर september से October तक ।

पौधों कटाई और छँटाई :

   काजू के वृक्ष को सही आकार देने हेतु कम से कम 4 सालो तक पेड़ की कटाई-छाँटाई करते रहना होता है। पेड़ के निचे के part से शाखाओ और डालियों को starting के 3-4 सालो तक हटाते रहना जरूरी होता है।

कीट नियंत्रण / Control Pets & Insects 

काजू में लगने वाले कीट कुछ इस प्रकार से होते है –

  • तना छेदक
  • स्टेम और रूट बोरर
  • थ्रिप्स
  • सुण्डी

इस तरह के कीटो की रोकथाम के लिए खेतो में कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है। इसके आलावा नीम का काढ़ा का भी छिड़काव कर के इन कीटो से बचा जा सकता है ।

रोग नियंत्रण :-

काजू में ज्यादा रोग नहीं लगता है । काजू में ज्यादातर एक हीं रोग लगती है जिसे चूर्णी फफूंदी रोग कहते है । इस रोग से बचने के लिए भी नीम की पत्तियों का काढ़ा का इस्तेमाल किया जाता है। 

फसल की तुड़ाई :-

परागण की क्रिया के बाद काजू के फलों को पक कर तैयार होने में कम से कम 60 days लग जाते है उसके बाद फल को पेड़ से तोड़ लिया जाता है ।  

उपज:
काजू की खेती में ज्यादा वर्षा होने वाले area में कम फसल की उपज होती है। यदि काजू की खेती में अच्छे से देख रेख की जाये तो उपज भी बहुत अच्छी मिल सकती है । एक पेड़ से लगभग 12 kg उपज प्राप्त किया जा सकता है ।

4 thoughts on “काजू की उन्नत खेती कैसे करे – Cashew Farming

  1. Hukum Chandra

    Sir west UP mai es ki farming hi Sakti h. Agar ho Sakti h to es ka bij Kha se buy kr Sakte h.

    Reply

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