Matangini Hazra – Bio in Hindi

By | April 21, 2017

भारत की स्वतंत्रा सेनानी Matangini Hazra जी का जन्म 1870 में हुआ था | जानिए उनकी जीवनों, birth, family, death से जुडी जानकारी Hindi में पढ़े | भारत में कई महापुरुषों ने जन्म लिया जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण तक न्योछावर तक कर दिए | इन सभी वीरो में एक नाम मातंगिनी हज़ारा का भी शामिल है | भारत के इतिहास में इनका नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है | हज़ारा महिला क्रांतिकारी थी जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया और अपनी आखरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ी | हज़ारा विधवा थी परन्तु समय आने पर इन्होने अपने शौर्य और साहस का परिचय भी दिया | लोग इन्हें गाँधी बूढी, बूढी लेडी गाँधी के नाम से भी जानते है |

Image Source – bharatmatamandir.in

Birth and Life

भारत के वीर क्रांतिकारी हज़ारा का जन्म पश्चिम बंगाल स्थित मदिनापुर जिले के होगला नामक गाँव में सन 19 October 1870 को हुआ था | इनका जन्म बहुत ही निर्धन परिवार में हुआ जिस कारण इन्हें शिक्षा दीक्षा से वंचित रहना पड़ा | इनके जन्म के समय हमारे देश में बाल विवाह प्रथा थी इस प्रथा एवं गरीबी के कारन इनका विवाह 12 वर्ष उम्र में 62 वर्षीय धनि विधुर त्रिलोचन हज़ारा से कर दिया गया | इनके विवाह के उपरांत इनकी किस्मत भी इनका साथ नहीं दिया और 18 वर्ष के आयु तक इनकी एक भी संतान नहीं हुई और इनके पति का स्वर्गवास हो गया | इनके पति के पहली पत्नी के संतान इनसे घृणा एवं अनादर करते थे, सौतेले बच्चो का इस व्यवहार के कारण मातंगिनी पति के मकान के पास एक कुटिया का निर्माण की और उस कुटिया में रहने लगी |

त्रिलोचन हज़ारा के पहली पत्नी के बच्चो के द्वारा अपमानित मातंगिनी घर के बाहर एक झोपडी का निर्माण कर रहने लगी | ये अपने जीवन व्यापन करने के लिए गाँव में मजदूरी करनी आरम्भ कर दी और मजदूरी में मिले पैसे या अन्न से अपना जीवन व्यापन करने लगे | मजदूरी के साथ अपना समय गाँव वालो के साथ बिताने लगी एवं गाँव वालो के सुख दुःख में अपना सहयोग देना आरम्भ कर दी | हज़ारा के द्वारा लोगो के प्रति इतनी आदर सतभाव को देख गाँव वाले इन्हें सम्मान देने लगे एवं पुरे गाँव में माँ के समान पूज्य हो गए |

Revolutionary Activities / क्रांतिकारी गतिविधिया

1905 में इन्होने गांधीवादी के रूप में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय हुई और आन्दोलन में बड़े चाव से हिस्सा लेती | इन्होने इस आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाई एवं मिदनापुर से यह पहली महिला क्रांतिकारी थी जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया | इन्हें आन्दोलनों में हिस्सा लेते देख अन्य महिलाओ के मन में भी स्वतंत्रता की ललक बढ़ी और धीरे धीरे मदिनापुर के सभी महिलाए एक साथ कदम से कदम बढाकर आन्दोलनों में हिस्सा लेना आरम्भ कर दिए |

मातंगिनी हज़ारा कई आन्दोलनों में हिस्सा लिए, आन्दोलनों में हिस्सा लेने के कारण अंग्रेजो ने इन्हें कई बार गिरफ्तार किया | 1932 में पुरे देश में गाँधी जी के नेतृत्व में एक आन्दोलन आरम्भ किया गया | इस आन्दोलन में आंदोलनकारियो के द्वारा प्रतिदिन जुलुस निकाला जाता था | जुलुस के पहले दिन जब जुलुस इनके घर के पास पंहुचा तो बंगाली रित के अनुसार शंख बजाकर जुलुस का स्वागत किया गया और उसमे शामिल हो गई | जुलुस आगे कृष्णगंज के बाजार में रुका, वह सभा हुई एवं सभी ने इस संग्राम में पुरे तन, मन एवं धन से संघर्ष करने के संकल्प लिया |

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1932 में चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में इन्होने भी हिस्सा लिया एवं इस आन्दोलन में Salt Act को तोड़ने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और थोड़े समय में रिहा कर दिया गया | 17 जनवरी 1933 के अंग्रेजो के द्वारा लिए जाने वाले कर के विरोद्ध में आन्दोलन किया गया जिसे करबन्दी आन्दोलन के नाम से जाना जाता है | इस आन्दोलन को शांत करने के लिए बंगाल के तत्कालीन गर्वनर एण्डरसन तामलुक आए | गवर्नर के विरोध में लोग प्रदर्शन कर रहे थे और इन सब के बीच हज़ारा काला झंडा लिए ब्रिटिश शासक के विरोध नारेबाजी करते हुए दरबार तक पहुच गई | यहाँ इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया एवं छः माह का सजा काटनी पड़ी |

Courage / साहस

मातंगिनी हज़ारा बचपन से काफी साहसी थी | 1935 में तामलुक क्षेत्र में भीषण बाढ़ का सामना करना पड़ा था | बाढ़ के शांत होने के उपरांत लोग हैजा एवं चेचक जैसे संक्रामक बीमारी के चपेट में आ गया | गाँव के अन्य लोग डर से उनकी मदद नहीं करने जाते थे | इस स्थिति में हज़ारा अपने जान का प्रवाह किए बिना लोगो को मदद करने के लिए आगे बढे | 1942 में जब भारत छोडो आन्दोलन चरम सीमा पर थी तो उस समय जुलुस के विरोध में अंग्रेजी सेना सामने आए एवं बन्दुक को लोगो की और कर उन्हें पीछे हटाने को कहा जाने लगा | अंग्रेजी फौज के इस प्रतिक्रिया से भारतीय पीछे हटाने लगे तब इन्होने तिरंगा लिए आगे आए और जुलुस का नेतृत्व करते हुए अपने जान तक गवा बैठी |

Death / मृत्यु

29 सितम्बर 1942 को हज़ारा जुलुस का नेतृत्व कर रही थी, एवं जुलुस का विरोध में अंग्रेजो के द्वारा भीड़ पर गोलिया चली गई जिस में मातंगिनी हज़ारा का स्वर्गवास हो गया |

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