मूंगफली की वैज्ञानिक खेती की जानकारी

By | August 9, 2016

क्या आप भी मूंगफली की वैज्ञानिक खेती करने की सोच रहे है? जानिये इससे जुडी जानकारी -मिट्टी, पानी और खाद और किन रोगों से बचाव कर के आप अच्छा profit इस business से कम सकते हैं | मूंगफली एक प्रकार का प्रसिद्ध तिलहन फसलो में से एक है | इसे लोग peanut या groundnut के नाम से भी जानते है | मूंगफली का Botanical नाम Arachis Hypogaea है | मूंगफली मुख्यतः प्राकृतिक प्रोटीन का सबसे अच्छा श्रोत है, इसमें प्राप्त प्रोटीन अन्य प्रोटीन श्रोत के तुलना में कई गुना अधिक होता है | प्रोटीन के साथ साथ मूंगफली खनिज और vitamins का भी अच्छा श्रोत है |

 

Mungphali yani Peanuts ki kheti kaise kare

Agar aapke pass kehti ke layak jamin ho to aap scientific tarike se mungphali ki unnat kheti kar ke accha khasa profit kama sakte hain. Austan aap ek baar mein 700 se 800 kg per acer par mungphali ka utpadan kar sakte hai.  Aur is kehti ko start karne ke liye investment bhi kam hota hai.  To chaliye jante hai kaise aap bhi Peanuts ki farming India mein kar ke kaise ek profitable business khada kar sakte hai:

मूंगफली में पाए जाने वाले तत्व

जैसा की हम सभी जानते है की मूंगफली आसानी से मिलने वाला और सस्ता सामन होता है इसलिए इसे आम भाषा में मूंगफली को ‘गरीबो का काजू’ भी कहा जाता  है | शायद आपको ये मालूम नहीं होगा की मूंगफली में काजू से अधिक पोष्टिक तत्व पाए जाते है | अन्य खाद्य प्रदार्थ के मुताबिक मूंगफली में कई गुना पोष्टिक तत्व अधिक पाए जाते है | मूंगफली में पाए जाने वाले पोष्टिक तत्व इस प्रकार है |

  • Energy
  • Carbohydrates
  • Fat
  • Protein
  • Vitamins
  • Calcium
  • Iron
  • Magnesium
  • Manganese
  • Phosphorus
  • Potassium
  • Zinc

मूंगफली के फायदे / Health Benefits of Peanuts

मूंगफली का सेवन करना हमारे सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है | शरिर के लिए आवश्यक पोष्टिक तत्व हमे आसानी से मूंगफली में प्राप्त हो जाता है | इन पोष्टिक तत्वों के अलावा मूंगफली हमे कई बीमारियों से बचाता है साथ ही ये हमारे पाचन शक्ति के साथ हमारे memory power को बढ़ावा देता है | मूंगफली में कई प्रकार के तत्व पाए जाते है जैसे Nutrients, Minerals, Vitamins और Anti-Oxident | ये हमारे शरिर के लिए काफी लाभप्रद है | इन के अलावा और भी कई फायदे है |

  • मूंगफली को भिगोकर रोजाना सुबह खाली पेट में खाने से हमारा शरिर दिन भर चुस्त और दुरुस्त रहता है |
  • मूंगफली का सेवन daily खाना के उपरांत करे तो हमारी स्मरण शक्ति बढती है और साथ ही ये हमारे पाचन शक्ति को मजबूत करता है |
  • मूंगफली में Unsaturated faty acid की उपस्थिति के कारण ये हमारे शरिर के cholesterol level को नियंत्रित किये रखता है और साथ ही हमे ह्रदय संबंधित बीमारियों से दूर रखता है |
  • मूंगफली का नियमित सेवन से ये हमे प्लेग जैसे बीमारियों से दूर रखता है |
  • अगर आपके हाथ या पैर के जोड़ो में दर्द होता है तो आप अपने जोड़ो पर मूंगफली के तेल से मालिश करे, इससे आपके जोड़ो का दर्द जल्द ख़त्म हो जाएगा |
  • वैज्ञानिको ने शोध में ये पता किया है की मूंगफली शरिर के बढ़ते हुए वजन को नियंत्रित करने में काफी मददगार साबित हुआ है |

मूंगफली की खेती / How to Start Peanuts Farming

मूंगफली मनुष्य के स्वस्थ के लिए काफी फायदेमंद होने के कारण लोगो में इसका इस्तेमाल काफी बढ़ा है, जिसके कारण लोग इसका खेती करना आजकल काफी पसंद करते है | भारत में मूंगफली की खेती अनेको राज्यों में की जाती है जिनमे यह प्रमुख है गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू तथा कर्नाटक के राज्यों में उत्पादन अधिक किया जाता है, परन्तु आज भारत के सभी राज्यों में इसकी खेती की जाती है | और आज कई स्थानों पर लोग इसका खेती कर अपना business चला रहे है | मुख्यतः मूंगफली का उत्पादन एक एक्कड़ में एक क्विंटल के आस पास होता है | परन्तु इसका उत्पाद इसके किस्म पर differ कर जाता है |

मूंगफली के किस्म / Varieties of Peanuts

भारत में मूंगफली के कई प्रकार के किस्म पाए जाते है, सभी किस्मो का अपना खासियत है | किसी भी फसल की खेती के लिए ये सबसे महत्वपूर्ण है की आप किस किस्म के बीज  का इस्तेमाल कर रहे है | फसल का उत्पादन इसके किस्म पर आधारित होता है | तो आइये जानते है भारत में पाए जाने वाले मूंगफली के किस्म और इनकी गुणवत्ता |

  • एके-12-24 – एके-12-24 किस्म के मूंगफली से 48% तेल प्राप्त की जा सकती है, ये 100-110 दिन में तैयार हो जाता है | इसका उत्पाद 500 kg प्रति एक्कड़ होती है |
  • जे-11 – जे-11 किस्म के मूंगफली में 49% तेल पाया जाता है, इसकी अवधि भी एके-12-24 की तरह है परन्तु ये गुच्छेदार होता है | इसका उत्पादन लगभग 600 kg प्रति एक्कड़ होती है |
  • ज्योति – ज्योति किस्म की मूंगफली जे-11 के तरह होते है, परन्तु इसमें तेल की मात्रा सर्वाधिक 53% होता है | ज्योति की फसल अवधि 105-115 दिन होती है, एवं इसका उत्पादन 650 kg प्रति एक्कड़ पाया जाता है |
  • कोंशल (जी-201) – इस प्रकार के किस्म का फैलाव ज्यादा नहीं होता है, परन्तु इसके बीज में 49% तेल की मात्रा होती है | इसका फसल अवधि ज्योति के जैसा ही होता है, और इसका उत्पादन 700 kg प्रति एकड़ तक होता है |
  • कादरी-3 – इस किस्म की खासियत है की ये सबसे कम समय में तैयार हो जाता है, इसे तैयार होने में 100 दिन लगते है | इसमें 49% तेल होता है, और इसका उत्पादन 800 kg प्रति एकड़ होता है |
  • एम-13 – इस किस्म की मूंगफली का खेती भारत में सबसे ज्याद पाया जाता है, इसमें 49% तेल पाया जाता है | इसका उत्पाद सबसे ज्यादा है ये 1100 kg प्रति एक्कड़ में उपज देता है |
  • आईसीजीएस-11 – आईसीजीएस-11 की किस्मे गुच्छेदार होती है, इसमे 48% तेल होता है | इसकी उत्पादन अवधि 100-110 दिन की होती है और इसका उत्पाद 800 kg प्रति एकड़ होता है |
  • गंगापुरी – गुच्छेदार किस्म की मूंगफली है, इसमे 49% तेल पाया जाता है | इसका उत्पादन अवधि 90-100 दिन की होती है और इसका उत्पाद 800 kg प्रति एकड़ होता है |
  • आईसीजीएस-44 – इस किसन की मूंगफली के दाने मोटे होते है, इसमे 49% तेल होती है और इसका उत्पाद अवधि 1000 kg प्रति एकड़ होता है |
  • जेएल-24 – अति शीघ्र पकने वाले किस्मो में से है जिसमे तेल की मात्र 50-51% होता है | इसका उत्पादन अवधि 90-100 दिन होता है | इसका उत्पाद प्रति एक्कड़ 700-750 kg होता है |
  • टीजी-1(विक्रम) – सबसे लम्बी अवधि वाला मूंगफली टीजी-1 है, इसका अवधि 120-130 दिन होता है | इसमे तेल की मात्रा 45-48% तक होता है | इसका उत्पादन प्रति एक्कड़ 800-1000 kg तक होता है |
  • आई.सी.जी.एस.-37 – इस किस्म के मूंगफली में तेल की मात्रा 48-50% तक होता है, इस किस्म का मूंगफली 105-110 दिन में तैयार हो जाते है | इसकी उत्पादन क्षमता 750-800 kg तक होता है |

जलवायु


मूंगफली को उष्ण कटिबन्ध फसल भी कहा जाता है | परन्तु इसकी खेती समशीतोष्ण कटिबन्ध के उन क्षेत्रो में किया जाता है जहा गर्मी का मौसम अन्य क्षेत्रो से लम्बी होती है | मूंगफली के उन्नत विकास के लिए अधिक वर्षा, अधिक गर्मी या अधिक ठण्ड लाभप्रद नहीं होता है | मूंगफली के अनुकर आने के समय इसे 14-15oC तापमान और फसल के वृधि के लिए 20-30oC तापमान की आवश्यकता होती है | इसके फसल में 30-60 cm की सिचाई अच्छी मानी जाती है | प्रयुक्त तापमान और सिचाई के साथ मूंगफली की खेती के लिए बलुवर , बलुवर दोमट , दोमट और काली मिटटी सबसे अच्छा होता है |

खेत की तैयारी / Preparation of Field

किसी भी फसल को करने के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करना अति आवश्यक है | फसल लगाने से पहले खेत को जोत कर अच्छी तरह भुर-भूरी कर ले | खेत की मिट्टी जितनी भुर-भूरी होगी मूंगफली उतना अधिक फैलेगा और इसका उत्पादन उतना ही अधिक होगा | इसलिए फसल लगाने से पहले खेत में 5-7 जुताई कर ले, जुटाई के उपरांत खेत से सारे खर पतवार को निकाल कर खेत को साफ़ कर ले | और खेत में दीमक न लगे इसके लिए आप अपने खेत में अंतिम जुताई से पहले क्विनलफोस 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर के दर से अपने खेत में डाले |

बुआई का समय

किसी भी फसल का बुआई का समय इसके उत्पाद पर असर डालता है | अगर आप समय पर फसल की बुआई करेंगे तो आपको इसका अच्छा उत्पाद मिलेगा और अगर समय से पहले या बाद किया गया तो मूंगफली का विकास अच्छे से नहीं होगा और production काम होगा | इसलिए बीजो की बुआई हमेसा मौनसून के आरम्भ (15 जून-15 जुलाई) में कर देनी चाहिए | इससे फसल का विकास अच्छा होता है |

बीज की बुआई

बीज को लगाने से पहले हमे कुछ बातो का ध्यान रखना अति आवश्यक होता है | लगाई जाने वाली बीज पुर्णतः पकी, मोटी, स्वस्थ के साथ साथ बीज कही से कटी फटी नहीं होनी चाहिए | बुआई से पहले अर्थात बुआई के 2-3 दिन पहले हमे स्वस्थ मूंगफली के छिल्को को सावधानी पूर्वक निकाल लेना चाहिए | अच्छी उपज के लिए ये अति आवश्यक है की खेत में बीज का इस्तेमाल उचित मात्रा में किया जाए | इसलिए प्रति एक्कड़ 30-40 kg बीज की बुआई सवोत्तम माना जाता है | बीज को बोते वक्त ध्यान रखे की बीज को अधिकतम 7 cm की गहराई में एक पंक्ति में लगाए और साथ ही दो पंक्तियों के बीच की दुरी 30-40 cm रखे एवं दो बीजो के बीच 20 cm की दुरी रखी जाती है |

बुआई के विधि

  • ऐसे तो बीज के बुआई का कई विधियाँ है परन्तु भारत में निम्न विधियाँ प्रचलित है |
  • हल के पीछे बोना – इस विधि में हल के द्वारा 5-7 cm की गहरी जुताई किया जाता है और साथ साथ बीज को लगाया जाता है |
  • डिबलर विधि – इस विधि का इस्तेमाल कम किया जाता है, क्योकि इस विधि में श्रम और समय की आवश्यकता अधिक होती है | इस विधि में बीज की बुआई डिबलर या खुरपी की सहायता से बीज को लगाया जाता है |
  • सीड प्लान्टर विधि – इस विधि का इस्तेमाल उन क्षेत्रो में किया जाता है, जहाँ कम समय में अधिक क्षेत्रफल में बीज लगाना हो | इस विधि में खर्च भी कम आती है |

खाद एवं उर्वरक

फसल के अच्छी उपज के लिए मिट्टी में पर्याप्त तत्व की उपस्थिति आवश्यक है | इसलिए बुआई से पूर्व खेतो में गोबर की खाद के साथ नीम की खली और अरंडी के खली का मिश्रण बना कर खेत में छिडकाव करना चाहिए | मूंगफली दलहनी फसल होने के कारण इसके उत्तम विकास के लिए फास्फोरस अति आवश्यक होता है | इसके लिए हमे 60 kg प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अपने खेतो में डालना चाहिए |

सिचाई

मूंगफली की खेती भारत के कई क्षेत्र में वर्षा के आरंभ में किया जाता है, इसके कारण इसमे सिचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती | परन्तु उन स्थानों में जहा इसकी खेती गर्मी में की जाती है वहा सिचाई की आवश्यकता 10-15 दिन में पड़ती है | मूंगफली के खेती में ध्यान रहे की मिट्टी में नमी बनी रहे, खेत में पानी जमने पर हमे पानी की निकाशी करना अति आवश्यक है | अन्यथा फसल पानी में सड जाएँगे |

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण    

मूंगफली के खेतो में समय समय पर निराई गुड़ाई एवं खरपतवार पर नियंत्रण करते रहना चाहिए | मूंगफली के खेतो में 15 दिन के अंतराल में 2-3 निराई गुड़ाई आवश्यक है | जब पौधो में फलियों का लगना आरंभ हो जाए तो निराई गुड़ाई की क्रिया को बंद कर देना चाहिए |

मूंगफली में लगने वाले किट

सभी फसलो के मुताबिक इस फसल में भी किट का प्रकोप देखा जा सकता है | इसमें कई प्रकार के किट पतंगे लगते है, चलिए जानते है मूंगफली में लगने वाले कीटो के बारे में, ताकि सही समय रहते मूंगफली के पौधे को बचाया जा सके और अच्छी फसल की प्राप्ति हो :

बिहार रोमिल सुंडी – यह एक मध्यम वर्गीय किट है जिसके पंख पर काले धब्बे होते है, और इसकी एक सुंडी होती है जो नारंगी रंग की होती है | ये पौधो के पत्तियों के उपरी सतह को खा जाता है जिससे पौधो में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होता है |

तम्बाकू की सुंडी – यह किट भी मध्यम आकर का होता है और इसका रंग हरा काला होता है | यह किट भी अधिकतर पौधो के पत्तियों को ही प्रभावित करता है |

सफ़ेद सुंडी – ये किट प्रायः जमीं के अन्दर पाया जाता है, जो मुख्यतः जुलाई और अगस्त के महीनो में सक्रिय रहता है | ये पौधो के जड़ो को खा जाता है, जिससे पौधे मर जाते है |

दीमक – मूंगफली की खेती के लिए सबसे खतरनाक किट दीमक है, ये अक्सर पौधो के जड़ो को और फलो को प्रभावित करता है |

रोग / Common Diseases 

रोग सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं पाया जाता है, ये हमारे फसलो में भी पाए जाते है | पौधो को सिर्फ किट से नुकसान नहीं पहुचता, कुछ बिमारिय ऐसे भी है जो मूंगफली के खेती को प्रभावित करते है | ये बिमारिय निम्न है |

  • एन्थ्रेकनोज
  • कोलर रोट
  • गेरुई
  • जड़ बिगलन
  • टिक्का रोग
  • चारकोल सडन

रोग एवं किट का रोकथाम

अगर बिज के उपचार कर के लगाने के पश्चात भी मूंगफली में किट या रोग का लक्षण दीखता है, तो आप ऐसे में 25 kg नीम के पत्ते को 50 ltr पानी डाल कर पानी आधा होने तक उबाले | जब पानी आधा सुख जाए तब इसे किसी बर्तन में छान कर शुरक्षित रख ले | अब 200 ltr पानी में 5 ltr नीम का पानी और 10 ltr गौ मूत्र का मिश्रण बना ले और इसे खेतो में छिडकाव करे | इसका छिडकाव किट के ख़त्म हो जाने या रोग के ख़त्म हो जाने तक करे |

कटाई एवं गहाई

सामान्य तौर पर जब पौधो के पत्तियों का रंग पिला पड़ने लगे या पत्तिया झड़ने लगे तब समझ लेना चाहिए की मूंगफली पूरी तरह पक गई है | अब इसकी कटाई कर फलियों को पौधो से अलग कर लेनी चाहिए | अब इस अलग किये हुए फलियों को धोप में तब तक सुखाना चाहिए जब तक इसमे मानी की मात्रा 10% ना रह जाए | जब फली सुख जाए तब इसका भण्डारण करना चाहिए |

2 thoughts on “मूंगफली की वैज्ञानिक खेती की जानकारी

  1. sanjay sarkar

    मोझे एम-13 – इस किस्म की मूंगफली के बीज चहिये.

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