रानी दुर्गावती जी का इतिहास – Rani Durgavati Biography

By | March 1, 2017

जानिए महान Rani Durgavati के history in Hindi और उनके बारे में जिनका जन्म 1524 में हुआ था | रानी दुर्गावती एक महान शाशक थी, पढ़िए उनकी जीवनी, marriage, और युद्ध के बारे में |  इनका birth 5th  October सन 1524 में बांदा district के कालिंजर किले में हुआ था । चूँकि इनका जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था इसलिए इन्हें “दुर्गावती” नाम दिया गया । वह अपने पिता “कीर्तिसिंह चंदेल” जो की कालिंजर के राजा थे उनकी एकलौती पुत्री थीं। वह बहुत हीं सुन्दर, सुशील, और साहसी कन्या थी। इनको  बचपन से ही साहस भरी कहानियां सुनना तथा पढ़ना पसंद था। यही नहीं उन्होंने बचपन में हीं घुड़सवारी तथा तीर व तलवार चलाना सीख लिया था । इन सब के अलावा इनको शिकार करने का भी शौक था । रानी दुर्गावती अपने पिता के साथ मिलकर शासन का काम भी देखा करती थी ।

Rani Durgavati ji ki Biography in Hindi

रानी दुर्गावती का विवाह / Marriage

जब वह विवाह करने योग्य हो गई तो उनके पिता ने उसके लिए राजपूताने घराने के राजकुमारों में से वर की तलाश की। लेकिन दुर्गावती गोण्डवाना साम्राज्य के “राजा संग्राम शाह मडावी” के पुत्र  दलपत शाह मडावी की वीरता पर मुग्ध थी और उन्ही से विवाह करना चाहती थी। उनकी की वीरता से प्रभावित होकर गोण्डवाना के राजा भी उसे अपनी बहु बनाना चाहते थे । परन्तु उनके पिता दलपत से उसका विवाह नहीं करवाना चाहते थे । अंत में दलपत और इनके पिता के बिच युद्ध हुआ और दलपत शाह इस युद्ध में जीत गए और उन्होंने दुर्गावती से शादी कर ली। रानी के ससुराल वाले और उसके मायके वाले दोनों हीं अलग जाति के थे लेकिन फिर भी उसके ससुराल वाले ने उसे ख़ुशी ख़ुशी अपनी पुत्रवधू बनाया था।

जीवन परिचय  / Life Introduction

विवाह के ठीक एक साल बाद एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम वीरनारायण था। जब Rani Durgavati  का पुत्र केवल 3 वर्ष का था तभी उनके पति दलपत शाह की मौत हो गई थी । पति के मौत के बाद दुर्गावती पर मानो दुखो का पहाड़ टूट पड़ा लेकिन उसने बड़े धैर्य के साथ सब कुछ सहन कर लिया ।

पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बैठाया और खुद उसकी रक्षिका बन कर राज के कार्य देखने लगी। वह  हमेशा अपने प्रजा का ध्यान रखती थी। अपने चतुर व बुद्धिमान मंत्री जिनका नाम “आधार सिंह” था रानी दुर्गावती उनकी सलाह और सहायता से अपने राज्य को आगे बढ़ाने लगी । रानी  ने सुसज्जित स्थायी सेना भी बनाई, कई सारे मठ, कुएं, और धर्मशालाएं भी बनवाईं। यही नहीं  उन्होंने अपने नाम पर रानीताल, अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, और अपने मंत्री “आधारसिंह” के नाम पर आधारताल बनवाया था । धीरे धीरे गोंडवाना राज्य शक्तिशाली और संपन्न राज्यों में गिना जाने लगा।

युद्ध और वीरगति 

जब रानी  की वीरता के बारे में मुगल बादशाह अकबर को पता चला तो अकबर ने दोस्त  आसफ खां के साथ मिल कर गोण्डवाना पर हमला कर दिया जिसमे उन्हें पराजित होना पड़ा । आसफ खां ने दूसरी बार दुगनी सेना ले कर फिर से गोण्डवाना पर हमला कर दिया। दुर्भाग्यवस इस बार इनके पास बहुत हीं कम सैनिक थे। युद्ध के दवरान लगभग 3 हज़ार मुगल सैनिक मारे गए परन्तु इस युद्ध में दुर्गावती की भी बहुत अपार नुकसान हुई ।

दुसरे दिन 24 June सन 1564 को मुगलों ने फिर से हमला किया । अपार नुकसान के बाद इनका पक्ष बहुत हीं दुर्बल हो गया था । रानी ने अपने बेटे नारायण को पहले हीं एक सुरक्षित जगह पर भेज दिया । युद्ध के दवरान एक तीर दुर्गावती के भुजा में लग गई लेकिन रानी ने उस तीर को अपनी भुजा उसे निकाल फेंका। उसके बाद एक और तीर उनकी आंख में मारा गया और रानी ने उस तीर को भी निकाल लिया लेकिन तीर की नोक आँखों में ही रह गयी और तभी एक और तीर उनकी गर्दन पर आकर धंस गई और बेहोश हो गयी |

जब वह समझ गई की उनका अंत समय पास आ गया है इसलिए उन्होंने अपने मंत्री आधारसिंह के पास जा कर उनसे आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे परन्तु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया । उन्होंने कहा की मै आपको इस युद्ध भूमि से बाहर ले जा सकता हूँ पर मेरे हाथ यह कुकर्म नहीं कर सकते हैं |  इसलिए रानी  ने अपनी कटार को खुद हीं अपने सीने में घोपकर अपनी जान दे दी । इस तरह 24 जून सन 1564 को रानी दुर्गावती को वीरगति की प्राप्ति हुई | उन्होंने लगभग 15 सालो तक गोण्डवाना पर शासन किया था।

Image Source – http://hindutva.info

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